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गोलू देवता न्याय के देवता

गोलू देवता न्याय के देवता



नमस्कार दोस्तों आज हम आपको अपनी इस पोस्ट में उत्तराखंड कुमाऊँ के लोकप्रिय व ईस्ट देवता गोलू देवता के बारे में बताएंगे जो न्याय के देवता भी कहे जाते हैं।

जय बाला गोरिया- 

न्यायकारी, दूधाधारी, गढ़ चम्पावत को राजा, झलराई को लाल तू, माता कालिंका को सांचो पूत, चितई चौधान में तू , घोड़ा संग घोड़ाखाल में तू, नमोव, चमड़खान और ताड़ीखेत में तू, सारे काली कुमाऊं तेरो राज गोरिया। धदिये की धाद सुनछे, दुखियाको को दुख हरछे, दूधक दूध पाणिक पाणी करछे। सांच मनल जो त्यर नाम ल्यौ उ कि मन इच्छा पूरि करछे। जय जय बाला गोरिया राति ब्याव, दिन दोपहर, त्यर नाम लिनू चार पहर, लगन लगे दिए, विघ्न हरे दिए। शोक संताप दूर करिए। मामू ( सैम राजा ) को साचो भांजा, गुरु गोरखनाथ को सच्चो चेला, हिले दे पतवार, लगे दे पार। एक बार, फिर तेरी जयजैकार।



गोलू देवता- 

कूर्मान्चल में व्यापक धार्मिक भावनाओं और उपासना पद्धतियों में ग्राम देवता या कुल देवता का विशिष्ट स्थान है। इनकी उपासना के मूल में भूत - प्रेत पूजा, सामन्ती व्यवस्था के प्रति तीव्र आक्रोश तथा अवर्गों के प्रति सवर्णो से प्रतिक्रियात्मक भावना व्याप्त है। इनमें सत्यनाथ, भोलानाथ, गंगनाथ, ग्वेल, सैम, ऐडी, भैरों, कलबिष्ट, चौमू, हरजू, भूमिया, नन्दादेवी, गरदेवी, ज्वालपादेवी, जियाराणी, झालीमाली आदि प्रमुख हैं। 


पौराणिक देवी - देवताओं की अपेक्षा, यहां के लोकजीवन को यहां के स्थानीय देवी - देवताओं ने अधिक प्रभावित किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये सभी क्षेत्रीय देवी देवता यहां की आदिम जातियों की देन हैं, जिन्होंने इन चरित्रों के माध्यम से अपना आक्रोश व्यक्त किया है। 


कूर्मांचल में हरु, सैम, गोलू ( गोरिल ) देवता आदि की गाथाएं लोक जीवन में खूब प्रचलित हैं। विश्वास किया जाता है कि चम्पावत के राजा ज्ञानचन्द, जिनको राज्यकाल कुमाऊँ का इतिहास के लेखक श्री बद्रीदत्त पाण्डे जी ने 1374 से 1419 बताया है, के समय चम्पावत के समीप गोरिल चौड़ और जागेश्वर के समीप झाकरसैम को केन्द्र बनाकर इन्होंने राजनैतिक गतिविधियों का संचालन किया। इनसे सम्बन्धित कोई लिखित इतिहास तो उपलब्ध नहीं है , किन्तु लोकगाथाओं से इनका पूरा चरित्र चित्रण हो जाता है।


गोलू देवता को न्याय का देवता भी कहा गया है। नदी में बहाए जाने के कारण इसका नाम गोरिया यो गोरिल्ल भी कहा गया है। गुलेल का निशानेबाज होने के कारण इसे ग्वल ( ग्वेल ) कहते हैं। इसका महत्व कुमाऊँ में ही नहीं, गौरेया नाम से उ.प्र. के पूर्वी जिलों में भी है। रियासत टिहरी के राजा सुदर्शन शाह ने अपनी रियासत में गोरिल्ल की पूजा पर प्रतिबन्ध लगा रखा था। अब तो गढ़वाल क्षेत्र में ग्वेल देवता की पूजा होती है। यह भी विश्वास किया जाता है कि यह बलपूर्वक अपनी पूजा लेता है। कुमाऊँ में गोरिल देवता के मन्दिर चौड, गरुड़, उदैपुर, मनारी, घोड़ाखाल, मानिल, कुमौड़, गागर रानीबाग, चितई आदि स्थानों में हैं।



गोलू देवता कालान्तर में यह अत्यन्त न्यायप्रिय राजा सिद्ध हुआ। जिसको कहीं न्याय नहीं मिलता था, वह गोलू देवता के पास आता था। मृत्यु के बाद भी ग्वेल राजा देवता के रूप में पूजा जाने लगा। लोक गाथाओं में गोलू देवता के दो रूप राजकुमार और गोलू देवता के पाए जाते हैं। इन्हें हम जीवनी और महातम्य के रूप में भी विभक्त कर सकते हैं। प्रारम्भिक गाथाओं में गोलू को ' धौली धुमाकोट ' से जोड़ा जाता है। लेकिन बाद की गाथाओं में चम्पावत से जोड़ा जाता है। 



चम्पावत नगर के समीप ' गोरिल चौड़ ' में चन्द राजा ज्ञानचन्द के शासन काल में गोलू ने अपना आश्रम स्थापित किया, जो बाद में कुमाऊँ का एक प्रसिद्ध धर्मस्थल बन गया। ' भनर्या ' नाम से भी वह प्रसिद्ध हुआ। ' ख्याल ' नामक शैली में ' भनय ' की जो गाथा प्रचलित है, उसमें गोलू देवता का नैनीताल में घोड़ाखाल जाने का वर्णन है। गोलू देवता पर नाथपंथ का पूरा प्रभाव था। दूसरे शब्दों गोलू देवता एक नाथपंथी जोगी थे।

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